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निबंध

अमरकांत के कथा साहित्‍य में निम्न मध्यवर्ग का जीवन यथार्थ

अमित कुमार विश्वास


अमरकांत के पात्र सीधे विद्रोह न करते हुए भी बेचैनी और परिवर्तन की इच्छा भीतर पैदा कर देते हैं - यशपाल

आधुनिक हिंदी कहानी के निर्माण व विकास में अमरकांत (1925-2014) का अप्रतिम योगदान है। वे स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी की यथार्थवादी परंपरा के प्रमुख कथाकारों में से एक हैं। उन्होंने स्वतंत्र भारत के शहरी निम्न मध्यवर्ग की आकांक्षाओं, जीवन की परिस्थितियों, चिंताओं और जीवन-संघर्ष को सजीवता से प्रस्तुत किया है। रचनाशीलता के जरिए वे अपने युग के मनुष्य, उसके परिवेश और भाग्य का समग्र बोध कराते हैं। दरअसल भारतीयों के लिए स्वाधीनता नई आशा की किरण और नई उम्मीद के रूप में आयी। जिस स्वप्न के लिए स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर किए गए थे, उसकी सार्थकता समय के साथ धुंधली हो गई। नैतिक लोकतंत्र की कल्पना मिथ्या साबित होने लगी और लोकतंत्र के भीतर पूँजीवादी-सामंतवादी ताकतों ने भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का अवसर दिया। जनता के मन में स्वप्नभंग और मोहभंग का दुःखद अनुभव उभरने लगा। ऐसे ही दौर में अमरकांत सन् 1950 से ताउम्र अपनी कहानियों में स्वतंत्रता की स्मृतियों और उसके टूटने की पीड़ा को प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से उकेरते रहे। उनकी रचनाओं की खासियत यह है कि वे मोहभंग के बाद भी नई उम्मीदों की पड़ताल करते हैं।

अमरकांत की कहानी 'बस्ती' का नायक आत्मानंद भी इसी मोहभंग का शिकार है। रामलाल और बांकेलाल के साथ मिलकर वह अपनी बस्ती के निर्माण में दिनरात संघर्ष करता है और आंदोलन छेड़ता है। रामलाल आंदोलन का मार्गदर्शन करता है और आत्मानंद भी उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करता है। दो वर्षों के अथक प्रयासों के बाद वे सफलता पाते हैं। वे गर्वोक्ति भाव से कहते हैं कि ''यह बस्ती हमारी न्यायसंगत आकांक्षाओं की साकार प्रतिमा है। इसकी प्रत्येक ईंट हमारे संघर्ष और इच्छाशक्ति की गाथा सुनाती है।'' बहरहाल कुछ ही समय में गली की ईंटें चोरी हो जाती हैं, बस्ती में अराजकता फैल जाती है। आत्मानंद काफी क्षुब्ध एवं भावुक हो जाता है और घोर उदासीनता में डूब जाता है।

अमरकांत ने शरतचंद्र को पढ़कर कुछ रोमांटिक कहानियाँ तो लिखीं पर वे सब कहीं प्रकाशित नहीं हो पायीं। उनकी पहली कहानी 'बाबू' आगरा से प्रकाशित 'सैनिक' के विशेषांक में प्रकाशित हुई लेकिन पांडुलिपि व मुद्रित प्रति उपलब्ध न होने के कारण वे 'इंटरव्यू' को अपनी पहली कहानी बताते हैं। उन्होंने अपने जीवन के कटु एवं यथार्थवादी पहलुओं को ही अपनी कहानियों का आधार बनाया। छोटे-मोटे रोजगार में सक्रिय, किराए के मकानों में रहनेवाले, कम आय वाले गृहस्थों से जुड़े पात्र उनकी चिंता के विषय रहे। इसी मध्यवर्ग के अंतर्गत आने वाले मलिन बस्तियों के निवासी, घरेलू नौकर, भिखारी और निर्वासित मजदूर भी उनकी कहानियों का अंश बने। इन पात्रों के माध्यम से उन्होंने सीमित साधनों में जीवनयापन, जिजीविषा और उदास भंगिमाओं को बड़ी शिद्दत के साथ अपनी रचनाओं में स्थान दिया है।

नौकर और भिखारियों के व्यथाकार : अमरकांत ने अपनी कहानियों में नौकरों और भिखारियों पर होने वाले व्यापक और निर्मम शोषण को बड़ी संवेदनशीलता के साथ उकेरा है। 'नौकर' कहानी में जन्तू नाम का नौकर वकील साहब के खानदानी घराने की सेवा बगैर किसी मान-सम्मान के करता है, परंतु जब वह बीमार पड़ जाता है तो घर के लोग उसे उपेक्षाभाव से देखते हैं। बस यह कहा जाता है कि "ठंडे पानी से नहा लो, ठीक हो जाएगा।" बीमारी के बाद कमजोरी आम है, पर जन्तू के पास विकल्प यही है कि काम जारी रखे, नहीं तो नौकरी चली जाएगी। अमरकांत की 'बहादुर' कहानी में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। विधवा माँ के संरक्षण से भागकर कथावाचक के यहाँ पहुँचा बहादुर सद्भावनापूर्ण व्यवहार की आशा लेकर आया था, पर कुछ ही दिनों में घर का लड़का उससे मारपीट और अपशब्दों के साथ दुर्व्यवहार करने लगा और निर्मला उसे रोटियाँ सेंकने को बाध्य करती रही। जब रिश्तेदारों के सामने बहादुर पर चोरी का झूठा आरोप लगा, तब भी उसकी बेगुनाही पर किसी को कोई भरोसा नहीं हुआ। अंततः अत्याचार और अपमान से तंग आकर बहादुर घर छोड़कर चला जाता है। निर्मला बहादुर की ईमानदारी व नैतिकता ही नहीं, बल्कि एक सच्चे, मेहनती नौकर की कमी के चलते बाद में पश्चाताप करती है। इन कहानियों के पात्रों की दासता और मजबूरी यही दिखाती है कि भारतीय समाज में नौकरों और वंचितों को आज भी गुलामीभरा जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ता है। अमरकांत ने समाज के अनछुए तबकों के दर्द, उनकी सहनशीलता और समाज की बेरहम मानसिकता को बारीकी से स्थान दिया है जिसके कारण पाठक स्वयं को उनसे अलग नहीं कर पाता।

भूख को साहित्यिक विमर्श बनानेवाले रचनाकार:अमरकांत ने अपनी कहानियों में भूख को एक सार्वभौमिक संकट के रूप में कहानी की विषय-वस्तु बनाया है। उनके पात्रों का सरोकार ही रोटी, कपड़ा और आश्रय जुटाने तक सीमित रहता है। कई पात्र तो कपड़े या मकान की कल्पना भी नहीं कर पाते; वे अभी पेट की क्षुधा को शांत करने की त्रासदी में ही फंसे हैं और भूख की सीमा से ऊपर उठने का मौका नहीं पा सके। उनकी कहानी 'दोपहर का भोजन' बेमिसाल है। इसके अलावा उन्होंने 'अमेरिका की यात्रा', 'तंदुरुस्ती का रोग', 'घर', 'कुहासा' और 'निर्वासित' जैसी कहानियाँ भी लिखी हैं जो भूख के विरुद्ध आम आदमी के अदम्य संघर्ष को दिखाती हैं। 'निर्वासित' कहानी में गंगू के परिवार व पत्नी के बीच टकराव की स्थिति अकाल व आर्थिक विपन्नता ही है।

अमरकांत एक ऐसे रचनाकारों में शुमार हैं जो भूख को केवल 'रोटी की तलाश' तक सीमित नहीं रखते अपितु उसे सामूहिक पीड़ा, संघर्ष व मानवीय गरिमा के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानी 'अमेरिका की यात्रा' में उस युवा का वृत्तांत है, जिसके लिए भूख की पीड़ा रोजमर्रा का प्रश्न नहीं अपितु महानता की ख्वाहिश प्राथमिक रही; ''सोचता है कि एक बहुत बड़ा आदमी बनने के लिए ही मेरा जन्म हुआ है। आश्वस्त स्वर में कहता है कि भारत में रहकर उन्नति करना मुश्किल है और इसके लिए अमेरिका जाना आवश्यक है।'' इसी तलाश में वह एक दिन निकल पड़ा, बिना टिकट के ट्रेन में चढ़ा तो टीटी ने उसे रास्ते में उतार दिया। उसके रोमांटिक स्वप्न यथार्थ की गर्म आग में झुलस गए। अमेरिका का सफर ठप कर, उसने भोजन व आश्रय की चिंता से उबरना सीखा। लेकिन पेट की भूख को शांत करने की दृष्टि से भटकते हुए वह एक मिठाई की दुकान पर पहुँचा जहाँ उसने देखा कि एक मजदूर का नमकीन सेव खाते वक्त उसका लंबा टुकड़ा जमीन पर गिर गया। भूख की तड़प के कारण यह विचार आया कि जब कोई न देखे, मैं तुरंत उसे उठाकर खा लूँगा। लेकिन मजदूर उससे भी चतुर निकला, टुकड़ा उठाकर खा गया। अमरकांत ने इस दृश्य को सरल शब्दों में पिरोया; ''खाने के वक्त एक लंबा टुकड़ा जमीन पर गिर गया था। न मालूम कैसे मेरे दिमाग में यह विचार आया कि मजदूर के चले जाने पर मैं सबकी आँखें बचाकर उस टुकड़े को सफाई से मुँह में डाल लूँगा। किन्तु, मजदूर मुझसे अधिक चालाक था। दोना साफ करने के बाद उसने जमीन पर गिरे सेव के उस टुकड़े को उठाकर गले में सरका लिया और फिर चलता बना।''

अमरकांत की कहानी 'घर' का पात्र एमए उत्तीर्ण बेरोजगार युवक विनय एक दिन तीव्र भूख से कराह उठता है। पिता के क्रोध में घर से निकल जाने का आदेश सुनकर वह बिना कुछ खाए चल पड़ता है। तेज धूप से बचने के लिए वह पास के पार्क में एक बेंच पर बैठ जाता है। भूख की तीव्रता बढ़ने पर वह पानी पीने लगता है। खाली पेट पानी पीने के बाद उसे उल्टियाँ आती हैं, उस दौरान आँसू और थूक के मिश्रित पानी से उसकी आँखें और नाक भींग जाती हैं, पर मुँह से कुछ भी निकलने को तैयार नहीं शायद अंदरूनी शक्ति क्षीण हो गई हो।

अमरकांत ने 'दोपहर का भोजन' की सिद्धेश्वरी, 'निर्वासित' की पत्नी और 'शाम' की लता जैसे पात्रों के जरिए पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री-क्षुधा की महीन पीड़ा को बड़े सलीके से उभारा है। ये महिलाएँ अपने भूखे पेट को अनदेखा कर पति और बच्चों को पहले खिलाती हैं। उनकी कहानी 'दोपहर का भोजन' गरीबी से जूझ रहे एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की है। इस कहानी में व्याप्त गरीबी को चिह्नित किया गया है। कहानी का पात्र सिद्धेश्वरी जब घर के सदस्यों को तृप्त देखकर आखिरी एक रोटी लेने बैठती है, तो सामने बरामदे में रोगी बच्चे प्रमोद की चिंता आ जाती है-इसलिए वह आधी रोटी उसके लिए बचाकर ही संतोष कर लेती है। भूख के मामले में ज्यादातर पुरुष इस असंतुलन को महसूस तक नहीं करते, इसलिए जब सहनशीलता टूटती है तो महिलाएँ अपनी व्यथा को तकरार में व्यक्त करती हैं। 'शाम' की लता पति से कहती है कि ''खुद उपवास करती हूँ, पर सबके सामने दो रोटी रखने की कोशिश करती हूँ।'' अमरकांत ने भूख से जूझते परिवारों में स्त्रियों पर पड़ने वाले सर्वाधिक शारीरिक और मानसिक पीड़ा को बड़ी मार्मिकता से पिरोया है। 'फर्क' नामक कहानी का लड़का थाने में कहता है कि ''जब भूख बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, तो मैं किसी के घर में घुसकर छिप-छिप कर खा-पीकर निकल आता हूँ।'' खाने की चीजें न मिलें तो वह हल्का-फुल्का सामान चुरा लेता और उसे बेचकर पेट भरने का इंतजाम करता है। लोग भूख की वैश्विक त्रासदी से जूझ रहे होते हुए भी उस भूखे लड़के को अपना सबसे बड़ा अपराधी मान बैठते हैं और उसे मारने-पीटने की माँग करने लगते हैं। भीड़ में न तो कोई उसकी व्यथा समझने की कोशिश करता है, न ही उस पर भरोसा जताता है।

अमरकांत की कहानी 'काली छाया' में देशव्यापी भुखमरी का जिक्र गाँववालों के कठोर मन को भी पिघला देता है। रात में प्रेमिका से मिलने आया युवक जब चोरी के शक में मार-पीटकर पेड़ से बाँध दिया जाता है, तो सभी उसे पाषाणचित्त समझते हैं। लेकिन सुबह, जब उसने अपनी ओर से स्पष्टीकरण दिया तो एक व्यक्ति ने कहा, ''देश के लोग भूखों मर रहे हैं।'' इस वाक्य से गाँव में दया और परोपकार की लहर दौड़ पड़ी और कुछ लोगों ने मिलकर उसके बाँधे हुए हाथ खोल दिए। यह दृश्य इस बात की तस्दीक करता है कि जब सामने कोई भूख से त्रस्त मानव होता है, तो अमानवीयता की जगह सहानुभूति, बंधुता और मानवता की भावनाएँ जागृत होती हैं। 'फर्क' कहानी में लोग चोर को देखकर देश में तानाशाही थोपने की ही बात करते हैं, जबकि 'काली छाया' भूख की मार में भी इंसानियत को बुलंद कर देती है। अमरंकात ने 'कुहासा' कहानी में अकाल के समय एक पिता अपने बेटे झींगुर को पीट-पीट कर घर से बाहर निकाल देता है क्योंकि गरीबी के कारण घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। इसी प्रकार वे 'एक बाढ कथा' में बाढ तथा अकाल जैसे प्राकृतिक प्रकोप को कहानी का विषयवस्तु बनाकर प्रशासन के भ्रष्टाचार और उनके द्वारा अपनाने वाले दोहरी नीति का पर्दाफाश करते हैं इतना ही नहीं, 'दर्पण' कहानी के माध्यम से वे नेताओं द्वारा गरीब विवश जनमानस का शोषण करने वाले चेहरों तथा भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं। यहाँ यह कहा जा सकता है कि अमरकांत ने अपनी कहानियों के जरिये देश की अधिकांश आबादी की दरिद्रता और भुखमरी को साहित्यिक विमर्श का मूल विषय बनाया है।

बेरोजगारी पर विमर्श करनेवाले व्याख्याकार : स्वातंत्र्योत्तर भारत में बेरोजगारी देश की सबसे गंभीर एवं व्यापक समस्या बनकर उभरी है। आज़ादी के बाद युवा वर्ग में यह आशा जगने लगी कि उच्च शिक्षा और स्वतंत्रता दोनों का फल उन्हें मिलेगा - उचित रोजगार, सम्मानजनक वेतन और स्थिर जीवन किन्तु उम्मीदों पर पानी फिर गया। शिक्षित नौजवान रोजगार पाने के लिए दर-दर भटकते रहे और बढ़ती महंगाई ने उनके अस्तित्व के संघर्ष को और तीव्र कर दिया। अमरकांत की कहानियों में अनगिनत पात्र ऐसे मिलते हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की, फिर भी रोजगार न मिलने के चलते रोटी-कपड़ा-मकान से वंचित हैं, उनका जीवन बदलने का सपना अधूरा रह गया। रोजगार उनकी सबसे बड़ी लालसा व आवश्यकता है, फिर भी मौकों का अभाव लगातार उनका पीछा नहीं छोड़ता। इन निराशाजनक वास्तविकताओं ने सामाजिक जीवन को प्रभावित किया और लेखक-साहित्यकार चुप्पी तोड़कर रचनाओं में बेरोजगारी की समस्याओं को उजागर करने लगे। अमरकांत ने 'डिप्टी कलक्टरी', 'इंटरव्यू', 'बेरोजगारों की बात' तथा 'दोपहर का भोजन' जैसी कहानियों में बेरोजगारी की मार्मिकता का बेवाक चित्रण किया है। 'डिप्टी कलक्टरी' कहानी में शकलदीप बाबू मुख्तार के रूप में एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार से हैं, बेटे नारायण को डिप्टी कलेक्टर बनाने के लिए वे कर्ज लेकर उसकी पढ़ाई और शुल्क की व्यवस्था करते हैं। दो बार असफल होने के बाद तीसरी बार नारायण परीक्षा उत्तीर्ण होता है, लेकिन परिणाम में सोलहवें स्थान पर रहने के कारण दस पदों की कट-ऑफ से बाहर हो जाता है। इस तरह न केवल बेटे का, बल्कि माँ जमुना सहित पूरे परिवार का मन निराशा में डूब जाता है। 'इंटरव्यू' कहानी राशनिंग विभाग में 60 रु. की क्लर्की के एक रिक्त पद के लिए सरकारी विभाग में होने वाले भ्रष्टाचार और युवाओं से झूठे वादों के चक्र को बयां करती है। देर रात तक प्रतीक्षा कराने के बाद जब चयनित अभ्यर्थी का नाम बताकर शेष उम्मीदवारों को भविष्य का भरोसा दिया जाता है, तो उनकी आशाएँ औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। अमरकांत ने इस दृश्य को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है- ''हमें खुशी है कि एक योग्य व्यक्ति को चुन लिया है। इस हालत में आप और लोगों का इंटरव्यू संभव नहीं था। अब शाम भी हो गई है, आप लोग किस तरह यहाँ कष्ट करके आए और शांतिपूर्वक खड़े रहे- उसके लिए हम आपको धन्यवाद देते हैं। साथ ही, यह भी आश्वासन देते हैं कि भविष्य में और जगह खाली होने पर आप सबको मौका दिया जाएगा।'' उनकी कहानी 'बेरोजगारों की बात' दो युवकों की व्यंग्यपूर्ण संवाद के माध्यम से बेरोजगारी की कारुणिक स्थिति को बयां करती है। अमरकांत की कहानी 'घर' का पात्र विनय एमए करने और टाइपिंग आदि सीख लेने के बाद भी बेरोजगार है। कहानी 'दोपहर का भोजन' का पात्र मुंशी चंद्रिका प्रसाद, जिन्हें क्लर्की की नौकरी से हटा दिया गया था, का परिवार बमुश्किल भोजन पर गुजर-बसर कर रहा था। इन रचनाओं के माध्यम से अमरकांत न केवल उस युग की सामाजिक कड़वी हकीकतों को सामने लाते हैं, अपितु समकालीन बेरोजगारी की समस्या पर सटीक विवेचन प्रस्तुत करते हैं। दरअसल उनकी कहानियों में रोजगार केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, अपितु जीवन की गरिमा को बनाए रखने, शिक्षा को सार्थक बनाने और सामाजिक-राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वाह करने का भी एक माध्यम है।

धर्म और आडंबर के विरुद्ध रचनेवाले लेखक : स्वाधीनता के बाद भारतीय समाज में मोहभंग की जो लहर उठी, उसने आम जनता में धर्म, ईश्वर और भाग्य के प्रति आस्थापूर्ण दृष्टिकोण को और प्रबल कर दिया। लोग अपने दुःख-दर्द को ईश्वर की दी हुई नियति मानकर भुलाने की कोशिश करने लगे। इस विश्वास का लाभ उठाने के लिए एक सुविधा-संपन्न वर्ग खड़ा हो गया, जिसने धार्मिक रूढ़ियों को अपने हित में मोड़कर आम जनमानस में वैज्ञानिक चेतना और यथार्थबोध को विलग कर दिया। यह वर्ग शोषणकारी के रूप में उसी व्यवस्था को बनाए रखना चाहता था जिसमें वह आराम से फल-फूल सके। धर्म को अपना औजार और ईश्वर को अपना खिलौना बनाकर उसने कर्म की अपेक्षा भाग्य को प्रधानता दी। परिणामस्वरूप, समाज प्रगति की राह से बहककर अंधविश्वासों के आगोश में आ गया। उनकी कहानी 'परमात्मा का प्रेमी' का नायक रामअवतार बाबू इसी अंधविश्वास का प्रतीक है। वह पूरे वर्ष गंगा में स्नान करता है, नियमित रूप से गीता-रामायण का पाठ करता है और पत्नी की गंभीर बीमारी पर भी डॉक्टर बुलाने के बजाय भगवान के भरोसे पर छोड़ देता है। बेटा डॉक्टर को बुलाता है। एक दवा की खुराक और फीस लेकर लौटने पर रामअवतार बाबू कहता है, ''यह जिंदगी भी क्या चीज है? आज हम हैं, कल नहीं होंगे। हर दिन लाखों लोग मरते हैं। मरना है तो मरना है - किसे क्या रोक सकता है?'' इसी तर्क से उसने सड़क पर पड़े एक घायल कुत्ते की जान बचने को भी ईश्वर का चमत्कार बताया। अपनी पत्नी की जान डॉक्टर की दवा से बची, इसे वह कहीं भूल गया। अलबत्ता अमरकांत ने इन कहानियों में उस आम आदमी की पीड़ा को उकेरा है जो अपनी बदहाली को भाग्य मानकर जीवन बिताता है और साथ ही उस संपन्न वर्ग का भी पर्दाफाश करता है जो धर्म-भक्ति के नाम पर समाज को अंधकार में धकेलकर अपने लालच की आग में जलता रहता है।

जाति-व्यवस्था पर कुठाराघात रचनेवाले कथाकार :जाति-आधारित भेदभाव ने सदियों से भारतीय समाज की जड़ों को खोखला कर दिया है। प्रारंभिक वैदिक युग में कर्म-आधारित समाज व्यवस्था बनी। कालान्तर में कर्म-आधारित व्यवस्था जन्म-आधारित जातिगत विभाजन में बदल गई, जिससे असमानता, भेदभाव और कट्टरता समाज में व्याप्त हो गए। दया, करुणा, अहिंसा, उदारता जैसे उदात्त गुण लुप्त हो गए और उच्चवर्णियों ने निम्नवर्णियों पर अपनी सत्ता कायम रखने के लिए उन्हें शारीरिक-मानसिक उपहास का पात्र बना डाला। अमरकांत अपनी कहानियों में अक्सर जाति को वर्गीय पहचान का प्रमुख तत्त्व मानते हैं और श्रमजीवी व वंचित तबकों में उच्च और निम्न दोनों जातियों के पात्रों को स्थान देते हैं। 'दलील' कहानी में रिक्शावाले के साथ विनय की बातचीत में जाति और पेशे का प्रश्न बार-बार दृष्टिगोचर होता है। रिक्शावाला कहता है, ''बाबुजी, हमलोग गोसाई कहलाते हैं। हमारी जाति किसी की नौकरी-चाकरी को तुच्छ समझती है। हम ईश्वर के वंशज हैं, ऋषि-मुनियों की कुलीनी, दुआ-आशीर्वाद के साथ ही माँगते-खाते हैं।'' उनकी कहानी 'प्रैक्टिस' में मलिन बस्ती के दयाल को, जिसका पेशा ही उसके लिए अभिशाप बना हुआ है, वकील बिहारीलाल डरा-धमकाकर पैसे वसूलता है, तो दयाल 'जनेऊ की कसम' खाता है। इस प्रकरण के माध्यम से अमरकांत यह जाहिर करते हैं कि ''जाति और वर्ग हमेशा एक-दूसरे के समानांतर नहीं चलते; भले ही कोई आर्थिक रूप से निचले दर्जे का हो, फिर भी उसकी मानसिकता में जातिगत श्रेष्ठता की भावना बलवती रहती है।'' अमरकांत ने अपनी कहानियों में ऐसे अनेक पात्रों के माध्यम से जातिगत शोषण को उजागर किया है। 'जिंदगी और जोंक' का रजुआ, 'दो चरित्र' का लड़का, 'बहादुर' का बहादुर और 'नौकर' का जन्तू... ये सभी पात्र उन्हीं मजबूरियों और अपमानों का सामना करते हैं जिन्हें केवल निम्न जाति के नाम पर बहुत कुछ सहना पड़ता है। उनकी व्यथा को उत्कीर्ण कर अमरकांत ने समाज के इस अँधेरे पहलू पर व्यावहारिक प्रकाश डाला है।

प्रेम विषय पर रचनेवाले कथाकार : अमरकांत ने स्त्री-पुरुष रिश्तों में पुरुषवादी मानस को बेहद बारीकी से उकेरा है। उनके पुरुष पात्रों के लिए स्त्रियाँ काम, प्रेम और परिवार के निर्वाह का साधन मात्र हैं; वे उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को स्वीकारने से कतराते हैं। उनकी कहानी 'लड़का-लड़की' का पात्र चन्दर एक आदर्शवादी विद्यार्थी है, जो राजनीतिक जुलूसों और आंदोलनों में भाग लेकर बौद्धिक रूप से जागरूक होता दिखता है, उसे एक साथी की तलाश है। तारा नामक लड़की धीरे-धीरे उसके हृदय में जगह बना लेती है। विषम पारिवारिक हालातों के बीच भी वह चन्दर की प्रेरणा से पढ़ाई में मन लगाती है। जब उसने पिता की अनुमति लेकर विवाह का प्रस्ताव चन्दर के सामने रखा, तो चन्दर ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। प्यार के सिलसिले में तारा ने चन्दर को अपनी मंजिल बना लिया, जबकि चन्दर का मंजिल तारा नहीं था। उनकी कहानी 'पलाश के फूल' का पात्र नवलकिशोर राय इतना कामांध और अनैतिक है कि अपने से आधी या उससे भी कम उम्र की लड़की को फँसाता है।

अमरकांत की कहानी 'मछुआ' का पात्र अनिलेश विवाहित था, लेकिन उसकी पत्नी गाँव में ही रहती थी। शहर में नौकरी से फुर्सत के पलों में वह महिलाओं को लुभाने की कोशिश करता मानो संसार में स्त्रियाँ मछलियाँ हों और वह एक मछुआरा। उसके पड़ोस में विधवा शिक्षिका सीता देवी अपनी बेटी नीरजा के साथ रहने आई। सीता देवी की उम्र चालीस और नीरजा युवावस्था में जा रही थी; दोनों पर उसकी नजर टिक गई। एक बार अनिलेश बीमार पड़ा तो सीता देवी और नीरजा ने उसकी पूरी सेवा की। इस देखभाल ने उसे परिवार के करीब ला दिया, लेकिन उसकी कामनाएँ नीरजा की ओर से ज्यादा तीव्र हो उठीं। निरंतर दोधारी स्थिति में फँसा नीरजा का प्रेम परवान चढ़ा तो अनिलेश के मन में भी आत्म-निरीक्षण जाग उठा। जब नीरजा ने खुले दिल से अपना प्यार पेश किया तब भी अनिलेश डगमगाया नहीं। उसने नीरजा को स्नेहपूर्वक समझाया, ''तुम पर गहरी जिम्मेदारियाँ हैं। तुम्हीं को अपनी माँ के दुःख को दूर करना है। तुमको आगे बढ़ना है।'' इस तरह अनिलेश ने नैतिक अपराध के गर्त में जाने और सीता देवी जैसे पवित्र हृदय को ठगने से खुद को रोका, लेकिन नीरजा के नाजुक मन में प्रेम का एक वीरानावशेष हमेशा के लिए बस गया।

अमरकांत का उद्देश्य केवल सामाजिक ढाँचे में स्त्री-पुरुष संबंधों को ही दर्शाना नहीं है अपितु पुरुष के मनोविज्ञान की गहरी तहों को उजागर करना भी है। उनकी कहानी 'एक निर्णायक पत्र' दिखाती है कि ऊँची शिक्षा और आधुनिक सोच के बावजूद भी पुरुषों के भीतर पुरुषवादी अहंभाव गहराई से जमे रहते हैं। कहानी का पात्र कुमार विनय पढ़ा-लिखा युवक है, जिसे भ्रष्ट आचरण व व्यवस्था की अनियमितताओं के कारण सरकारी नौकरी नहीं मिल पाती। इस हताशा में वह जीवनपर्यंत अविवाहित रहने और स्त्रियों से दूरी बनाए रखने का संकल्प लेता है। स्वाभिमानपूर्वक वह कोचिंग सेंटर खोलता है, जहाँ उनके अनुशासन से कई विद्यार्थी सफल होते हैं जिसमें नीति भी शामिल है। वह विनय के मार्गदर्शन से लखनऊ मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेती है। विदाई के समय दोनों एक-दूसरे से समर्पण की कसमें खाते हैं, लेकिन पढ़ाई में उसकी व्यस्तता और संकोच से नीति विनय को पत्र नहीं लिख पाती। बातचीत का अभाव और एक मित्र से मिलन की चाहत से विनय तीन बार लखनऊ जाकर भी नीति से नहीं मिल पाता, तो वह मान बैठता है कि नीति जान-बूझकर दूरी बना रही है। तीसरी यात्रा पर वह जब अचानक उससे मिलने पहुँचता है, तो होटल के कमरे में गुस्से और अधिकारभाव से जबरदस्ती उसके कपड़े उतारता है। नीति स्तब्ध रह जाती है, कोई विरोध नहीं कर पाती, पर अंतःमन से क्षुब्ध हो उठती है। पल भर के लिए निश्छल प्रेम का धुँआ चिरकालिक खामोशी में बदल जाता है। बाद में विनय को अपनी गलती का अहसास होता है। कुछ दिनों बाद वह पत्र लिखता है, जिसमें नीति की प्रशंसा और कुछ 'ध्यान रखने योग्य' बातें हैं। नीति पत्र पढ़ते ही उसे कूड़ेदान में फेंक देती है-जैसे वह 'गुरु दक्षिणा' की भावना से बँधी थी, न कि प्रेम से। परिणामस्वरूप, परीक्षा परिणाम के दिन नीति विनय को धन्यवाद स्वरूप पैर छूती है।

अमरकांत की कहानियों में सामाजिक मर्यादाएँ इतनी प्रबल हैं कि प्रेम के रिश्ते बिना किसी बाहरी टकराव के भी उन्हीं बंदिशों के पिंजरे में कैद हो जाते हैं। उन्होंने 'असमर्थ हिलता हाथ' कहानी में समाज में विवाह पूर्व प्रेम सबंधों की महीन पड़ताल किया है। कहानी की पात्र मीना अपने भाई के दोस्त दिलीप से प्यार करने लगती है, जिसकी वजह से परिवार में कलह होता है। मीना का भाई चिल्लाकर कहता है- ''मैंने आईन्‍दा तुमको कभी उसके साथ देख लिया तो मार डालूँगा। मैं नहीं जानता था कि वह आस्तीन का साँप है।'' उनकी माँ भी आक्रोश जताते हुए उसके पढ़ाई-लिखाई बंद करने की बात कहती है। 'हौंसला' शीर्षक कहानी की कमला पढ़ी लिखी समझदार लड़की है जो अपना जीवनसाथी खुद चुनती है। वह अपने साथ नौकरी करने वाले राजेन्द्र से प्रेम करके शादी करना चाहती है। इस प्रेम विवाह को कमला की माँ अनुमति दे देती है परन्तु उसके पिता हरनाथ कड़ा विरोध करते हुए कहते हैं- ''मैं जब तक जिन्दा हूँ यह शादी नहीं हो सकती। मुझे समाज में रहना है कि नहीं।'' उनकी कहानी 'रिश्ता' बेजोड़ है। इस कहानी में वर्णित है कि, गरीब जुलाहे के बेटे नईम के माता-पिता नहीं थे, इसलिए मास्टर रामानुज सिंह ने उनसे फीस न लेते हुए पढ़ाया। नईम गुरुजी का परम शिष्य बन गया। गृहस्थ जीवन न होने के कारण उसने मास्टर परिवार में बेटे की तरह अपना स्थान बना लिया। मास्टर साहब की बेटी नीरू नईम की सहपाठी थी। पढ़ाई के दौरान नीरू और नईम की बचपन की दोस्ती परवान चढ़कर प्रेम में बदल गई। एक दिन जब दोनों अकेले मिले, तो नीरू ने हिम्मत जुटाकर नईम से प्रेम का इजहार किया। इसपर नईम ने प्यार की मिठास को स्वीकार किया, लेकिन परिवार और समाज की मर्यादा का हवाला देते हुए बोला, ''नीरू, तुम मेरे लिए सबकुछ हो, लेकिन मास्टर साहब के रिटायर होने वाली उम्र, तुम्हारी दो बहनों की जिम्मेदारियाँ और गाँव में अफरातफरी - इन सबका ख्याल रखना होगा।'' नीरू ने भी समर्पण दिखाया और अगली मुलाकात में कह दिया, ''नईम, तुमने जो कहा, ठीक कहा। तुम मेरे लिए भाई ही रहो, इस रिश्ते को कभी खत्म न होने देना।'' आखिरकार नईम ने नीरू की शादी अपने आईएएस मित्र विवेक से करवाई। इस तरह नीरू और नईम दोनों ने अपने प्रेम को पारिवारिक सत्कार और सामाजिक मर्यादाओं के अनुकूल रखा।

इसप्रकार अमरकांत की कथाओं में अकाल से जूझे, असफल और हताहत प्रेम की पीड़ा एक तरह की कसक और कलप लिए उपजी दिखती है। यह न तो किसी आदर्शवादी नैतिक आग्रह का परिणाम है, न ही प्रेम-विरोधी सामाजिक रूढ़ियों के अनुपालन से उत्पन्न दायित्व-बोध का। इसकी जड़ उनकी सजीव यथार्थवादी दृष्टि और कथात्मक सौंदर्यबोध में है, जिन्होंने निम्न मध्यवर्गीय जीवन के अनुभवों को कहानी में उकेरा, उनमें इसी प्रकार का प्रेम-विद्रोह, संघर्ष और विफलता बिना किसी लाग लपेट के दृष्टिगोचर होता है।

स्त्री संवेदनशील रचनाकार : अमरकांत की रचनाओं में मध्यवर्गीय स्त्रियों की व्यथा बारंबार स्पष्ट रूप से उद्घाटित होती है। ये पात्र सामाजिक बंधनों और आंतरिक द्वंद्वों के जटिल जाल में उलझकर जीवनयापन करते दिखाई देते हैं। इसके विपरीत, उनके निम्नवर्गीय महिला चरित्र अपेक्षाकृत अधिक स्पष्टवादिता, तार्किकता एवं व्यवहारोन्मुखता का परिचय देते हैं, जिससे उनके संघर्ष और निर्णय-दोनों ही गहराई से समझ में आते हैं।

उनकी रचनाओं में नारी संवेदनाएँ दो अलग-अलग रूपों में उभरकर आती हैं। एक ओर युवा, शिक्षित और प्रगतिशील पात्र हैं-जो नारी को भी समान अवसर, शिक्षा तथा समतामूलक समाज बनाने की बात करते हैं। दूसरी ओर वे पात्र हैं जो नारी का केवल शोषण करना चाहते हैं। उनकी कहानी 'पलाश के फूल' में रायसाहब नारी को 'माया' कहकर घोर नकारात्मक दृष्टि से देखते हैं: ''स्त्री माया है! उसमें शैतान का वास होता है, वही भरमाता, चक्कर खिलाता और नर्क के रास्ते पर ले जाता है।'' रायसाहब इसतरह इसलिए बोलते हैं क्योंकि अँजोरिया के साथ लंबे समय तक शारीरिक संबंध रखने के बाद जब वह यह कहती है कि साथ रहे-रखैल के रूप में-तो रायसाहब को अपनी सामाजिक इज्जत पर खतरा नजर आता। 'मुक्ति' कहानी में मोहन कई वर्षों तक अपनी पत्नी को छोड़कर मधु के साथ संबंध बनाए रखता है, लेकिन ससुर की ओर से भारी रकम और जमीन का लालच मिलते ही वह मधु को पथभ्रष्ट मानकर उससे दूर हो जाता है। स्त्री-विमर्श की दृष्टि से 'मछुआ' कहानी बेजोड़ है। कहानी का पात्र अनिलेश का मानना था कि ''भव सागर में स्त्रियाँ मछलियाँ हैं और वह मछुआरा।'' उसके मुताबिक जाल बिछाने के लिए चतुराई और अनुभव चाहिए और स्त्रियों को स्वभाव से बुरा नहीं ठहराया जा सकता; मेहनत वहीं करनी चाहिए जहाँ सफलता की उम्मीद हो। इसलिए वह गरीब परिवारों की महिलाओं, कमजोर पतियों की पत्नियों और घरेलू अन्याय से असंतुष्ट युवतियों को लक्षित कर योजनाएँ बनाता था। बात दीगर है कि अमरकांत अपने कथा-संसार में निम्न मध्यवर्ग की महिलाओं के जीवन के विभिन्न आयामों को उद्घाटित करते हुए उनके साथ होने वाले अनोखे शोषणों को रेखांकित करते हैं। 'भूस' की परबतिया अपने पति की इच्छाओं की पूर्ति के लिए घर में एक नई युवती को बुलाती है।

अमरकांत ने अपनी कहानियों में दोनों ही आयामों यानी अन्याय सहते अशिक्षित स्त्री-पात्रों और संघर्षरत, आत्मसम्मान की रक्षा करने वाली सुशिक्षित नारी को सजीवता से प्रस्तुत किया है। है। अमरकांत की 'लाखो' कहानी एक स्त्री के जीवट की कथा तो है ही साथ ही तत्कालीन समाज की कथा भी है जो उसे इंसान की तरह जीने नहीं देता। इसमें स्त्रियों की संपत्ति में अधिकारहीनता को दर्शाया गया है। इस कहानी की नायिका लाखो गंगा किनारे सजावट वाले मेले में बैठी रो रही मिलती है। पूछने पर वह व्यथा सुनाती है कि ससुराल वालों ने उसे नाव पर चढ़ाकर नहलाने ले जाकर वहीं छोड़ दिया, जबकि देवर, जेठानी सभी नीला-नीला पानी छलकाते हुए चले गए। इस धोखे ने लाखो को भीतर तक झकझोर दिया।

अमरकांत ने अपने रचना-संसार में निहायत सहिष्णु और चुप्पी से शोषण सहने वाली नायिकाओं के साथ-साथ उन स्त्रियों की भी जीवंत तस्वीर उकेरी है जो अपने अस्तित्व संकट से लड़कर प्रतिरोध की रणभूमि में उतर आती हैं। 'तूफान', 'प्रिय मेहमान' और 'लड़का-लड़की' जैसी कहानियाँ इसी साहस और आत्मविश्वास का प्रभावशाली दस्तावेज हैं। 'तूफान' कहानी में प्रेम विवाह तथा आंतरिक प्रेम संबंधों को उजागर किया गया है, जिसमें एक पिता अपनी पुत्री की शादी एक बड़े घर में करना चाहता है। दहेज जुटाते-जुटाते पुत्री की आयु बढती जाती है और वह प्रेम विवाह करने पर मजबूर हो जाती है। 'कला प्रेमी' कहानी संग्रह में कहानीकार ने नारी के प्रति गहरी सहानुभूति भी प्रकट की है। अमरकांत ने बदलते सामाजिक परिवेश में स्त्री के प्रति बदलते मूल्यों को रेखांकित किया है। उनकी कहानियाँ भारतीय महिलाओं की पीड़ा और सामाजिक-संरचनात्मक उत्पीड़न को गहरे करुणा और सहानुभूति के साथ सामने लाती हैं।

सोशल ऑडिटिंग करनेवाले कथाशिल्पी : अमरकांत नौकर और भिखारियों के व्यथाकार के रूप में, भूख को साहित्यिक विमर्श बनानेवाले रचनाकार के रूप में, बेरोजगारी पर विमर्श करनेवाले व्याख्याकार के रूप में, जाति-व्यवस्था पर कुठाराघात करनेवाले कथाकार के रूप में, धर्म और आडंबर के विरुद्ध रचनेवाले लेखक के रूप में, प्रेम विषय पर रचनेवाले गद्यकार के रूप में और स्त्री के प्रति संवेदनशील कहानीकार के रूप में पाठकों के बीच जिंदादिली के साथ मौजूं हैं। ऐसा वही लेखक कर पाता है जो अपनी रचनाओं में अपने व्यक्तित्व को अनावृत्त कर पाठकों के भीतर एक आत्मीयता वाला भाव जगा देता है। पाठक को लगता है कि अरे! यह लेखक तो जाना-पहचाना सा है। हमारी ही बातें कर रहा है। उनकी कहानियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। वे न केवल कथ्य और शिल्प की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, अपितु सामाजिक चेतना व मानवीय संवेदना से भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने हिंदी कहानी को एक नई दिशा दी - जहाँ कला और संवेदना का संतुलन, यथार्थ और करुणा की संगति तथा सामाजिक सरोकारों की स्पष्टता दृष्टिगोचर होती है। आज जब साहित्य में बाजारवाद और विषयगत विकर्षण बढ़ रहा है, अमरकांत की कहानियाँ हमें फिर से मनुष्य को केंद्र में रखने की प्रेरणा देती हैं इसलिए उनके विशाल रचना-संसार का पुनर्पाठ किया जाना चाहिए और साथ ही भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में उसका अनुवाद भी, ताकि आनेवाली पीढियाँ उनका अन्वेषण करेंगी, उनपर शोध होने से हिंदी साहित्य और भी समृद्ध होगा। किसी भी साहित्यकार या लेखक का मूल्यांकन समग्रता में किया जाना चाहिए ताकि आलोचकीय पक्ष भी पाठकों के समक्ष आ सके। शताब्दी वर्ष में अमरकांत का भी समग्रता में मूल्यांकन होना चाहिए।

संदर्भ :

1. अमरकांत (1998). अमरकांत की संपूर्ण कहानियाँ. खंड 1, इलाहाबाद: अमर कृतित्व प्रकाशन।

2. खरे, नीति. (अप्रैल, 2017). अमरकांत की कहानियों में भारतीय समाज. IJERMT. Volume 4, Issue-2

3. चौहान, शैलेन्द्र. अमरकांत के कथा साहित्य में स्त्री की उपस्थिति. https://junpth.com/review/portrayal-of-middle-class-women-char stories/?form=MG0AV3&form=MG0AV3

4. पांडेय, आनंद. अमरकांत https://samalochon.com/amarkant/?form=MG0AV3&form=MG0AV3 कहानियाँ.


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